लेख 1
तारण थारै हाथ हैं , मारण थारै हाथ।
चरणा मैली "वंदना" आ ही म्हारे हाथ।।
--कवि राम सिंह सोलंकी
मैं सोलंकी वंश की वंशावली लेखन के उद्देश्य से राजसमंद जिले में ठिकाना झीलवाडा हाज़िर हुआ। यहां मेरे पन्द्रह दिन के प्रवास में डाक्टर गोविंद सिंह जी सोलंकी से मुझे स्व0 कवि राम सिंह जी सोलंकी को सच्ची श्रध्दांजलि स्वरूप "कवि राम सिंह सोलंकी स्मृति ग्रंथ" प्राप्त हुआ। यह स्मृति ग्रंथ " प्रताप शोध प्रतिष्ठान " व्दारा प्रकाशित है। कवि श्री राम सिंह जी सोलंकी झीलवाडा ठाकुर साहब मदन सिंह जी अनुज पुत्र थें। आपकी मायड भाषा में काव्य रचना अतुलनीय हैं। आपकी रचनाऔं में " जन नायक प्रताप , ओ भाई प्रताप रो , जोबन म्हारे देश , पन्ना धाय आदि। आपने अन्तस् मन से भाव विभोर काव्य लेखन किया हैं।आपको महाराणा प्रताप साहित्य सम्मान 1999 , राजस्थानी भाषा सेवा सम्मान 2003 , विधा प्रचारिणी सभा (भूपाल नोबल्स संस्थान , उदयपुर) से सम्मान और जौहर स्मृति संस्थान , चित्तोड से प्रतिक चिन्ह प्राप्त कियें। आपके स्मृति ग्रंथ में मुख्यमंत्री , कई संस्थानो , ठिकानो व सम्बन्धियों के श्रध्दांजलि संदेश प्रकाशित हुए। उन्हीं श्रध्दांजलि संदेशो में से एक मरसीया जो " रामसी " के नाम से महाराज शिवदान सिंह जी "कारोही" ने अन्तस् मन से उद्ग्रत किया।
" रामसी "
स्याही शुषगी ठाम , कलमां ठमगी छी जठे।
याद कराया राम , चाल धराया रामसी।।
स्याही तदस्त शुष्क तो लेखनी स्तब्ध हो गई , राम (ईश्वर) ने जैसे ही स्मरण किया , रामसी (सिंह) चल धरे।
रहि बरसां रमतीह , जे हाथां में रामसी।
वे कलमां थिरथीह , स्याही जमगी छी जठे।।
लेखनी जो रामसी के कर में वर्षोपर्यन्त क्रियमाण रही अब थम गई है स्याही शुष्क हो गई हैं।
जिण बक माणी प्रीतडी , तेगां सूतांणीह।
वांई बक कवि रामसी , भगती अजमाणीह।।
जिस युक्ति के साथ प्रीत को परचाया , खाण्डेखण्डकाऐ वैसे ही युक्ति के साथ कवि रामसी ने भक्ति को भी अनतरंगीत किया हैं।
शूंरा ने सुजसाइसा , भगतां ने भजियाह।
प्रेम्यां ने प्रीपाइया , गाथा कविता गाह।।
वार्ताओं को काव्य में कह कर शूरवीरों को यशस्वी , भक्तो को श्रध्दास्पद तो प्रेमियों को अनुरागित किया हैं।
कुण देवेला दाद , कूंपळती कलमां इब।
कठे करां फ़रियाद , राम-शाळ रीति पड़ी।।
उदयमान गति पकड़ती लेखनियों को अब कौन प्रोत्साहन देगा , किसे हमारी पीड़ा - व्यथा दिखावें राम - साला रिक्त जो पड़ी हैं।
संरग मांइ पेली हटो , थारू निजू निवास।
जा कीदौ वां छांगने , हरिचरणा में वास।।
आपका भौतिक निज - निवास पूर्व ही गगनावस्थित था। वह अब उससे भी ऊंचा हरि के चरणों में हो गया हैं।
भांगीज्यो आधार , छेलो झेलो रामसी।
कुण लेवे भुज - भार , इब मायड - भाषा तणो।।
रामसी जो अन्तिम अवलम्ब थे वह आधार भी भंग हो चला हैं , अब मातृभाषा राजस्थानी का भार कौन अपने कंधो पर धारण करेगा।
कलम पड़ी खजसीह , सूखासी, स्याही पड़ी।
यादां'ई आसीह , नी पुनरासी रामसी।।
अब लेखनी निष्क्रिय ही क्षय को प्राप्त होगी , स्याही पड़ी - पड़ी ही शुष्क होगी। केवल स्मृतियों का ही आलोकन होगा।रामसी की पुनरावृति तो कदापि नहीँ होगी।
कलमां थमगी छी जठे , ठरकी स्याही ठाम।
कागद रीता रैयगा , कुण खैंचे श्री राम।।
लेखनी जहां थी वहीं स्तब्ध हो गयी , स्याही जहां थी वही जम गयी पत्र रीते रह गये अब उन पर ' श्री राम ' भी कौन अंकित करे।
मूक थवाणो साद , दरसण का सांसा पड्या।
रह रह आवे याद , कवियां कोविद रामसी।।
वाणी मूक हो गई हैं , दर्शन का अभाव उपस्थित हैं।अब तो आपकी स्मृतियां मात्र ही शेष है।
राम - शाळ रीति पड़ी , धावे काटणियांह ।
कुणी करे कवियां - सुलभ , मीठी मसकरियांह।।
कवि सुलभ मधुर विनोदोक्तियां अब कौन करेगा , राम साला रिक्त जो पड़ी हैं , जो काटने को दौडती हैं।
नरेन्द्र सिंह धन्नावत "टोंक"
📞 9929106655

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