बल्ला राजवंश - संक्षिप्त इतिहास
बल्ला राजवंश - संक्षिप्त इतिहास
बल्ला क्षत्रिय वंश की उत्पत्ति इतिहास में पूर्ण व सही जानकारी कम लिखित मिलती हैं। प्रस्तुत लेख …
क्षत्रिय कुल वंशावली लेखक बडवा भगवत सिंह जी ठिकाना "सिंहपुरा" (भीलवाडा) की लिखी पुस्तक " बल्ला राजवंश का संक्षिप्त इतिहास " के सन्दर्भ पर आधारित हैं।
बल्ला राजवंश :--बल्ला क्षत्रिय वंश की उत्पत्ति राम के पुत्र कुश से हुई हैं।
कुश - अतिथि - निषध - नभ - पुण्डरिक - क्षैमधान्व - देवानिक - अनिह - पारियात्र - बल्लस्थल के दो पुत्र वज्रनाभ , शलनाभ हुए।
वज्रनाभ अयोध्या के उत्तराधिकारी हुए। बल्लस्थल अपने छोटे पुत्र के साथ अयोध्या से प्रस्थान कर सिन्धु नदी के प्रदेशो को विजय करके बल्ल क्षैत्र स्थापित किया। बल्ल से बल्ल वंश (बल्ला क्षत्रिय) का विकास किया।यह वंश समयानुसार बल्लवल , बलभी , बलश्री , बलहार और वर्तमान में बल्ला वंश के नाम से प्रसिध्द हैं।
वद कार्तिक सनी नवमी त्रैता चतुर्थ चरण।
बलवंश उत्पन्न भयो-धरयो नाम बल्लस्थल।।
बल्ल की मृत्यु के बाद शलनाभ बल्ल क्षैत्र का उत्तराधिकारी बना।शलनाभ ने अपनी माता आरूरी के नाम से आरूर नगर स्थापित किया। शलनाभ के बाद राजरख जिसका दूसरा नाम बल्लराय था उत्तराधिकारी हुआ। बल्लराय के सौभाग्यसेन के राजसेन व्दितीय हुआ। राजसेन व्दितीय ने सिकन्दर की सेना से युध्द किया जिसमें सिकन्दर से परास्त हुआ (सन् 326 ई• पू•)। राजसेन के पुत्र गंगासेन के मुलक (बालादित्य) जिसने मूलस्थान नामक नगर बसाया। जिसे वर्तमान में मुलतान कहते हैं। यह स्थान अब पाकिस्थान में हैं। बालादित्य ने सिन्धु नदी के तट पर विशाल सुर्य मन्दिर का निर्माण करवाया।यह मन्दिर अपनी विशाला के कारण विश्व प्रसिद्ध था।इस मन्दिर का वजुद 9वीं से 10वीं शताब्दी तक मौजूद था। समयनुसार यह मन्दिर विदेशी आक्रान्ताऔं की भेट चढ़ गया। बालादित्य के बाद ठट्ठा के शासक बालादित्य का पुत्र पदमादित्य सन् 222 ई•पू• मगध नरेश अशोक के सामंत के रूप में रहा। बल्ल वंश के पदमादित्य के पुत्र भोगादित्य ने 190 ई•पू• ठट्ठा से प्रस्थान करके कोठेश्वर , मांडव्य , भद्रेसर से विराट प्रदेश में सोराष्ट्र पहूंचा।यहां हूणो के राज्यों को जीतकर अपनी शरण स्थली बनाई। हूणों को परास्त करके भोगादित्य ने अपने नाम से भोगी पाटण शहर स्थापना करके राजधानी बनाई सन् 185 ई•पू•। भोगादित्य के विलम्भदित्य हुआ।इस राजा ने गोगा नदी (जो अब गेलो नाम से पहचानी जाती हैं) के किनारे विशाल शिवलिंग एवं नंदी की मूर्ति स्थापित कर सूर्यकुंड का निर्माण करवाया।तथा सन् 80 ई•पू• वलभी नामक भव्य शहर बसाया।जो वलभीपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विलम्भदित्य ने वलभीपुर में "अम्बा माता" का मन्दिर बनवाया।वलभी नगर अपनी कला शिक्षा एवं वैभव के कारण कांलान्तर में विश्व प्रसिद्ध कला शिक्षा के क्षैत्र में कला केन्द्र रहां हैं।विलम्भदित्य महान दानी , उदार व धार्मिक राजा थे। इन्होने मुक्त मन से दान पुण्य किये। जिससे इनकी कीर्ति दूर-दूर तक फैली।कस कारण प्रजा इनको "कीर्तिसेन" के नाम से सम्बोधन करती थी।विलम्भदित्य के पश्चात् वलभी पर अनेक शक्तिशाली राजा हुए। इनमें कनकसेन , विजयसेन , ध्रवसेन , एवं राजसेन।
ध्रवसेन ने कंन्नौज एवं ठाणेश्वर के शक्तिशाली राजा हर्षवर्धन की पुत्री चन्द्रा से विवाह किया।ध्रवसेन ने अपने आराध्य देव सूर्यनारायण का भव्य मन्दिर का निर्माण तथा महायज्ञ करवाया। इस अवसर पर अन्नकुट लुटवाया जिससे दूर - दूर तक धान के डोगरे (अनाज के ढेर) लगवाये । यह क्षैत्र धानपुर धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।वर्तमान में यह स्थान चौटिला(गुजरात) से कुछ दूरी पर स्थित हैं।ध्रवसेन के पश्चात राजसेन हुआ। इसका शासन काल वि•स•884 में शिवी क्षैत्र (मेवाड) पर बगदाद के खलीफा महमूद ने आक्रमण किया।उस समय मेवाड के शासक रावल खुमाण व्दितीय ने अपने हितेषी राजाऔं से सहायता मांगी। मेवाड की रक्षा के लिए चौटिला (गुजरात) के बल्ला राजा राजसेन ने अपने पुत्र सियड(श्री हर्ष) , उदयपाल , धरमपाल , चाऊराव एवं गजो जी को पांच हजारी सहायता देकर रावल खुमाण व्दितीय की सहायतार्थ चित्तोड भेजा।वि•स• 884 सन् 828 ई• में रावल खुमाण व्दितीय की सामुहिक सेना एवं खलीफा महमूद के मध्य खमनोर स्थान के पास युध्द हुआ।यह युध्द कितना भयानक था। इसकी कल्पना कवि ने इस प्रकार की हैं :---
संमत आठै चौरासिए , महैमदे करी ठेस।
सुन पुकार खुमाण सी , रज चढीया शिबी देश।
केशरिया कर्या ललाट , भगमा कर्या भेष।
धड कट्या खंगधार में , रज भिडियी शिबे देश।
रण भदी घर बजी, भिडियां रजवंशी वीर विशाल।
रंगत रमीया रगत रा फाग , भिडिया शेर सियाळ।
चौटिला कंवर झूझीया , बणया चित्तोडी ढाल।
धन - धन रानी कहैर ने , जणीयों सियड भवरेश।
खोख उजाली बला तणी चोटिला पंथ नरेश।
इस युध्द में बल्ला सरदारो ने अभूत पूर्व वीरता का प्रदर्शन करते हुए विजय प्राप्त की,
सियड जी ने भादू के मीणा को परास्त कर भदेसर बसाया। सियड जी के पुत्र गंगराव मीणो से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनकी मृत्यु के समाचार सुनकर सियड जी की पत्नी आनंद कंवर ने पुत्र शोक में अपने प्राण त्याग किये। आनन्द कंवर की याद में सियड जी ने भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया। तथा आनन्दपुरी गांव की स्थापना हुई।वर्तमान में यह गांव अरनोद के नाम से प्रसिध्द हैं। सियड जी के चार पुत्र हुए।संचाईराव , गंगराव , भाण जी , भरत जी
वर्तमान समय में बल्ला राजपुत मेवाड क्षैत्र के उदयपुर , थोरिया घाटा , राजनगर में अधिक हैं।
बल्ला राजवंश की शाखा परवर :--
शाखा :-- कानावत , रत्नावत , बिडावत , मथुरावत , लूणावत , जगावत , पुजावत और लखमावत
वंश सूर्य रघुकुल - कश्यप गोत्र प्रमाण।
सरस देवी कालका - गुरु वशिष्ट का ज्ञान।
यजुर्वेद प्रवर तीन - शाखा माध्यान्दिन जान।
स्वामी धर्म पितृ बल्ल - सूर्य वंश बल्ला प्रमाण।
गढ अयोध्या निकास भयो - गादी ठट्ठा मुलतान।
सूर्य देव स्थापना कर्या - गढ मुलक स्थान।
देवी कुल री सरस कालका - अम्बा चावण्डा सतयुग जान।
भैरू पूजा भदेसरियो - नित राखे कुल रो ध्यान।
ध्वजा फडके केसरिया - ज्या पर सूर्य निशान।
करे नगाड़ा जय विजय - सूर्य वंश बखाण।
नरेन्द्र सिंह धन्नावत "टोंक"
(सोलंकी वंश के वंशावली लेखक)
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