लेख- 2 क्षत्रिय कुल के वंशावली वाचक मागध वशी: बडवा (राव) जाति …

क्षत्रिय कुल के वंशावली वाचक मागध वशी: 
बडवा (राव) जाति …

           दोहा :--
पूरब कल्प संवाद यक , शिव प्रथुसन जो कीन।
ताही को बरनंत हूँ , सारशास्त्र श्रुति चीन।।

यहि छन्द के मांइने , उत्पत्ति प्रगट प्रवान।
सार-सार पुनि लिखत हो , जानत सकल जहान।।

आदि कौन को प्रगट किये , कौन वंश सूचि होय।
याको अबे उदाहरण , प्रगट सुनायहुँ तोय।।

चेत करहुं सब जन सुभट , राखहु दिल में गौर।
छल पांखड सब छेद्र तज , मतना मचावहुं सौर।।

कैसे मागध वंश को , प्रगट किया किन कोय।
सो वृतांत सब समुझि के , श्रवण सुनायहुं सोय।।

प्रगटे विधि ते प्रथम ही , पुनि पृथु युग परकासु।
जनमें मागध सूत जन , जस प्रसंस जग जासु।।

पृथु भुव पति प्रगटे तबे , जब सूत मागध (बडवा) जान।
है हरि वंश पुराण में , इनहूं को बखान।।

         चौपाई :--
पिता यज्ञ जब किन नृपाला।
सोम बलि रसमुनिन निकाला।।
बाही समय सुनो बुध्दिवाना।
मागध सूत जग जाना।।
राजा पृथु के यज्ञ में ब्रह्मा आदि ऋषि मुनियों ने मानसिक योग से मागध जी को प्रगट करना और उनको
वरदान देना :--

      छन्द पद्धरी :--
तब धरे ध्यान उर धरेउ धीर ,
तहां प्रगट भयेउ एक महावीर।
कर जोरि बेहूँ अस्तुति कीन ,
धन हो पितामह तुम अधीन।।
केहि काज मोहि तुम प्रगट कीन्ह ,
कृतार्थ भयो मैंआप चीन्ह।
अब पिता मोहि निज चरण लेहु ,
निज काज आज बरदान देहु।।

ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर राजा पृथु सें मागध वंश क्षत्रिय कुल वंशावली की स्तुति कर रहा हैं। जो वर्तमान समय में मागध वंशी(ब्रह्म कुल) बडवा जाति कहलाती हैं। तथा मागध वंशी(ब्रह्म कुल) बडवा जाति क्षत्रोत्पन जातियों की वंशावली वाचन व लेखन करती हैं।

         चौपाई :--

चक्रवृती के ये गुण बरणे , सुन पृथु भूप लगे सो हो करणे।
दान पुन्य नृप करहि हमेशा , दीन दान कवि न दोय देसा।।
देश अनूप सूत कवि लियेवु , मगध देश मागध को दियेवु।
मगध देश मागध के नामा , इनको प्रथम पुर ग्रामा।।

दोहा :--
उग्रश्रवा भये सूत, सूत सौ पुराण अधिकार।
भये अलिल मागध तनय वरणत वंश विचार।।
कनक चण्ड ताके कुवंर सुवन तासु सुख सेन।
बडवानल अरू बांधजन बुध बरवंश प्रवेन।।
बडवा मागध कुल भये बंधी जनके भाट।
भये सूत के व्दिज भले करे पुरान न पाठ।।

मागध वंश को उदयपुर महाराणा साहब व्दारा शोलियां निवासी बिठलदास जी को बडवा जी नामक सम्मानित पदवी संवत 1628 में ईनायत हुई। तथा संवत 1887 में जौधपुर महाराजा मान सिंह जी ने गुदड जी को "राव" पदवी व डेगाना के पास अलतवा , कुचीपुला की जागीर का 5 किलोवज़नी ताम्रपत्र लिखकर ईनायत किया। जब से बडवा (राव) समाज "राव" पदवी का भी प्रयोग करती है।
जब से यह वंश मागध वंशी बडवा (राव) कहलाने लगें। मागध वंश का अन्य वंशावली वाचक समाज व नौ न्यात से कोई सम्बन्ध नहीं हैं।

मागध वंशी बडवा जाति के पास कई बड़े-बड़े कुलो की पुरानी वंशावलियां , बही खाते हैं। आज भी बड़े-बड़े राजपूत स्टेट , सोलह बत्तिस ठिकानो से मागध वंशी बडवा (राव) जाति को पूजनीय सम्मानित सम्मान करते हैं। इनमें अलवर , जयपुर , बुन्दी , जौधपुर , किशनगढ , सीकर , बीकानेर , जैसलमेर , उदयपुर , सीतामऊ , रतलाम , देवास , सिरोही , रिवा , राहोगढ आदि।ऐसे कई ठिकानों से मागध वंशी बडवा (राव) जाति को छड़ी चपडास , ताम्रपत्र , पट्टा-परवाने , पाँव में सुनागा व ज़मीन , जागीर आदि ईनायत हुई हैं।

नरेन्द्र सिंह धन्नावत "टोंक"

टिप्पणियाँ

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  2. बडवा राव समाज का तथ्यात्मक तरीके सें उदगम व इतिहास बताने के लिये आपका हार्दिक आभार

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