वंशावली की उत्पति और महत्व …
नरेन्द्र सिंह धन्नावत "टोंक" (राज•)
सनातन धर्म में वंशावली लेखन व स्तुति की उत्पति का उल्लेख राजा पृथु से मिलता हैं।
श्लोक :--
राजसुया अभिषिक्ताना मागध सब सुध्द दियतस्मा चेव: समुत्पन्नो , निपुणों सूत मागधो " हरिवंश पुराण !
यज्ञ से अभिषिक्त राजाऔं में प्रथम पृथु उत्पन्न हुए।बाद में उसी यज्ञ से सूत , मागध हुयें। " तास्मिन्द्रो महायज्ञ प्रप्ते यज्ञડथ मागध "
उसी यज्ञोपवीत से मागध जी हुयें।( शिव पुराण धर्म संहिता षटपंचादश अध्याय 56)
ऐसा ही विष्णु पुराण अं• 1अ•13 श्लोक 52 में लिखा हैं :--
यथा " तस्मिभेव महायज्ञो जज्ञो प्रज्ञो थ मागध: "
अर्थात पृथु के यज्ञ से मागध का जन्म हुआ।
सूत मागध जी की उत्पति के बाद दोनो को महर्षियों ने महाराज पृथु की स्तुति करने लियें कहा गया।
श्लोक :--
" तच्छ त्वाशीस्तु चक्राते यज्ञस्तो सूट मागध "
-- शिव पुराण
यह कार्य तुम्हारे अनुकूल है और महाराज पृथु इसके अनुरूप हैं।
यह सुन सूत , मागध ने कहा हम अपने कर्मो से देवताऔ तथा ऋषियों को प्रसन्न करते हैं। इन महाराजा का नामकर्ण , लक्षण और यश कुछ भी हमें ज्ञात नहीं हैं।जिससे तेजस्वी महाराज की हम स्तुति कर सकें।
ऋषियों व्दारा कहने पर सूत और मागध को भविष्य में होने वाले गुणो का उल्लेख करते हुये स्तुति करने को कहा सूत और मागध ने पृथु की स्तुति का गुण गान किया।और वंशावली वाचन व लेखन का कर्म राजा पृथु के व्दारा चलाया गया।तथा सूत , मागध से आशीर्वाद लेने की परम्परा का चलन हुआ।
" पौथी वंश की किरत कथा , वंशावली गुण भेद।
पृथु से चली रीत सजल , कुल वंश का वेद।।
वंशावली का महत्व :--
वंशावली लेखन व वाचन का महत्व किसी लोक मान्यता या पौराणिक ग्रन्थों की तरह हैं। सनातन धर्म में अठारह पुराणो के बाद " वंश पुराण " उन्नीस वा पुराण हैं।जो हस्तलिखित पाडुलिपियों में संग्रहित हैं।देव पुराण हम किसी भी प्रेस या पुस्तक भण्डार से प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन वंश पुराण वंशावलियाँ मागध वंश या गंगा गुरु के पास हस्तलिखित पाडुलिपियों के रूप में उपलब्ध हैं।इनको प्राप्त करना दुर्लभ हैं।यह कुल वंश का आइना हैं। वंशावलियां वह बीज मंत्र है जो श्रवण मात्र से पीढ़ियों के पापो का नाश करती हैं। इसको समझने के लिये एक उदाहरण हैं :--
अगर किसी व्यक्ति को कोई किट या बिच्छू डंक मारता हैं।तो उसका ज़हर शरीर मे प्रविष्ट होने पर कष्टदायक हो जाता हैं।उस ज़हर को किसी सिध्द पुरुष व्दारा बीज मंत्र से निषक्रिय कर दिया जाता हैं। यह बीज मंत्र उस जीव की उत्पति (वंशावली) का वाचन हैं। एक जीव भी अपने कुल की वंशावली को सुनने पर ज़हर को छोड़ देता हैं। जिससे जीव प्रसन्नता को प्राप्त करता हैं।
वाचन लेखन पारखी , वंशावली गौरव मान।
वाचक मागध वंश हैं , कुल की महिमा जान।।
" बाडव वंश पवित्र अंश विधि रच्यो विचिक्षण।
प्रगटे तीन से सुभगपुत्र ओर्व शुभ लक्षण।
वंश अंश क्षत्रियन के कवि लिखे-लेख शुभसाद के।
भाषत वंश विवेक पुत अस बडवा वीर विचार के।।
क्षत्रिय वंशावली वाचन करने वाले मागध वंशी बडवा कहलाते हैं।
वंशावली में नौ बाते मिलती हैं :--
गौत्र शाखा अवकंटश्च वेद देवी गणाधिम।
शिव भैरव सरस्वती जैव जानाती बाडवा:।।
अर्थात :-- गौत्र,शाखा,वंश,वेद ,देवी,गण,शिव,परवर और भैरव आदि वंश वंशावली की बातें बडवा ही जानते हैं।
राजा पथु के समय से नृप क्षत्रिय तथा राजवंशियों की वंशावली लिखने का कर्म मागध वंश करता चला आ रहा हैं। वर्तमान समय में वंशावली कर्म करने वाली मागध वंश (बडवा जाति) के अलावा अन्य जातियो ने भी इस कर्म को अपना लिया हैं।जो अक्षत्रिय कुलो की वंशावली लेखन करतें हैं।अत: आज के युग में सर्व समाज की वंशावलियाँ अपने-अपने जाति के कुल गुरूऔ के पास उपलब्ध हैं।
जिन्हें प्रत्येक जाति के लोग अपने कुल की वंशावली नियमित समय पर सुनते हैं।और अपने कुल को याद रखते है। कभी कोई विवादास्पद बात हो जाती हैं तो वंशावली के माध्यम से सुलझाने में मदद मिलती हैं। प्राचीन समय से वर्तमान समय तक वंशावली लेखन प्रत्येक समाज के जीवन में विशेष महत्व एंव स्थान रखता हैं। वंशावली कर्म करने वाले समाज का आज भी वंशावली कर्म से आजीविका का संचार हो रहा हैं।आज छापाखाने के आने के बाद भी अनेक ऐतिहासिक पुस्तकें छपने लगी हैं।लेकिन वंशावली परम्परा का महत्व व आदर कभी कम नहीं हुआ हैं। वंशावलियों का मुल्य रत्नो से भी अधिक हैं।क्योंकि रत्न केवल बाहरी चमक-दमक दिखाते है। लेकिन वंशावलियाँ हमारे अन्त:कर्ण को उज्ज्वल बनाती हैं। अत: वंशावलियों को सुनना सनातन धर्म में कल्याणकारी उपलब्धि हैं।
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